भारत में अप्रैल में लुब्रिकेंट्स मांग 14 महीने के निचले स्तर पर

By Base Oil News, in collaboration with Rosefield Energy Tech
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Summary
  • मार्च में अग्रिम खरीद के बाद अप्रैल में मांग में तेज गिरावट दर्ज की गई।

  • रिकॉर्ड वाहन बिक्री और स्थिर ईंधन खपत से कुछ सहारा मिला, हालांकि लागत दबाव बना रहा।

  • कमजोर रुपये और महंगे आयातित कच्चे माल ने उत्पादकों पर दबाव बढ़ाया।

भारत में बेस ऑयल और लुब्रिकेटिंग ऑयल की मांग अप्रैल में घटकर 14 महीने के निचले स्तर पर आ गई। मार्च में बड़े पैमाने पर हुई अग्रिम खरीद के बाद कंपनियों ने जमा स्टॉक का उपयोग किया, जबकि बढ़ती लागत और आपूर्ति बाधाओं ने बाजार की गति को धीमा कर दिया।

पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के संशोधित आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल में कुल मांग घटकर 361,000 टन रह गई। यह मार्च के 480,000 टन से काफी कम है और फरवरी 2025 के बाद का सबसे निचला स्तर है।

मांग में गिरावट
मांग में गिरावटपेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय

मार्च में संभावित आपूर्ति व्यवधान और कीमतों में तेजी की आशंका के कारण खरीदारों ने बड़े पैमाने पर अग्रिम खरीदारी की थी। वित्त वर्ष के अंत में होने वाली सामान्य खरीदारी ने भी मांग को अतिरिक्त समर्थन दिया। इसी कारण अप्रैल में मांग में मौसमी गिरावट अपेक्षा से अधिक गहरी रही।

हालांकि, उत्पादक कंपनियों ने कीमतों में बढ़ोतरी की, लेकिन यह वृद्धि मार्च में कच्चे तेल की कीमतों में आई तेज तेजी की तुलना में सीमित रही। इसके कारण मांग पर तत्काल बड़ा असर देखने को नहीं मिला।

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अप्रैल में खुदरा ईंधन कीमतें स्थिर रहीं, जबकि वाहन बिक्री और ईंधन खपत मजबूत बनी रही।

भारत में अप्रैल के दौरान वाहन बिक्री रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची, इसके बावजूद लुब्रिकेंट्स की मांग में गिरावट दर्ज की गई।

मुख्य बिंदु

  • अप्रैल में मांग साल-दर-साल 9% घटी — चार महीनों में तीसरी गिरावट और जून 2025 के बाद सबसे तेज कमी।

  • डीजल खपत साल-दर-साल 1% बढ़ी और लगातार 14 में से 13वें महीने वृद्धि दर्ज की गई।

  • वाहन बिक्री साल-दर-साल 13% बढ़ी और अप्रैल के लिए रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई।

  • अप्रैल में ईंधन कीमतें स्थिर रहीं, हालांकि मई में एक वर्ष बाद पहली बार बढ़ोतरी दर्ज की गई।

बाज़ार पर प्रभाव

घरेलू उत्पादकों ने शुरुआत में मार्च से पहले खरीदे गए अपेक्षाकृत सस्ते बेस ऑयल का उपयोग कर लागत दबाव को कुछ हद तक नियंत्रित किया। हालांकि, नई खरीद महंगी होने और मार्जिन घटने के कारण यह राहत धीरे-धीरे कम होने लगी।

बढ़ती लागत के दबाव में कंपनियों को कीमतें बढ़ानी पड़ीं। कमजोर रुपये और आयातित कच्चे माल की बाधित आपूर्ति ने बाजार की चुनौतियों को और बढ़ा दिया।

ईंधन, लुब्रिकेंट्स और आयातित कच्चे माल—तीनों की बढ़ती लागत आने वाले महीनों में मांग पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती है।

यह लेख Base Oil News में प्रकाशित मूल अंग्रेज़ी रिपोर्ट का हिंदी अनुवाद है।

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